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मई, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

राजनेताओं द्वारा मूवी का उपयोग क्यों?

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'द केरला स्टोरी' जो कि एक मूवी है, उसे लेकर राजनेता कैसे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने में लगे हैं। भारत में चुनाव होता है कि हम भारतीय एक अच्छा,ईमानदार,लोगों के जीवन को बेहतर बनाने वाला लीडर व नेता चुन सके, पर क्या चुनाव में ऐसी मूवी का रिलीज होना और राजनीतिक दलों का इस मूवी का उपयोग करना भारत के लोकतंत्र के लिए वाकई ठीक हैं? मूवी और राजनीतिक दलों का कहना है कि सत्य घटना है। अगर यह वाकई सत्य है तो फिर सवाल खड़े होते हैं कि इतनी सारी लड़कियां गुमशुदा हो गई तो केंद्र में हिंदू विंग की सरकार है 2014 से अभी मई,2023 तक।   तो केंद्र ने ध्यान क्यों नहीं दिया? दूसरा सवाल है कि इतनी सारी लड़कियां गुमशुदा हो गई तो थाने में एफआईआर कहा है?  तीसरा सवाल अगर एफआईआर हो गई थी तो पुलिस ने क्यों नहीं ढूँढा?  चोथा सवाल अगर वाकई कोई साजिश हुई है तो केंद्र में गृह मंत्री ने क्यों एक्शन नहीं लिया स्टेट पुलिस के खिलाफ? सुप्रीम कोर्ट का आदेश केरला स्टोरी पर। यह प्रतीत करता है कि राजनेता जनता को डरा कर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करना चाहते हैं क्या भारत की जनता को इतनी ...

वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इन्डेक्स

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वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इन्डेक्स रिपोर्ट तैयार कौन करता है? जवाब है रिपोर्टर्स विदाउट बोर्डर। यह देशों में पत्रकारिता की स्वतंत्रता पांच बिंदुओं पर तय करता है- 1. राजनीतिक सन्दर्भ, 2. कानूनी ढांचा, 3. अर्थिक सन्दर्भ, 4. सामाजिक-संस्कृतिक संदर्भ, 5. सुरक्षा।  प्रेस फ्रीडम  क्या पत्राकार इतने स्वतंत्र है देश में की वे राजनीतिक मुद्दों पर जनता व देश के हित के लिए पत्रकारिता का काम कर सके? क्या पत्रकारों पर कोई राजनीतिक प्रेशर तो नहीं है कि वे ख़बरों को किसी पार्टी के पक्ष में चला रहे हैं?  भारत की पत्रकारिता इन बिंदु पर कहाँ खड़ी हुई हैं? ये बात हम सब जानते हैं रवीश कुमार का एनडीटीवी से इस्तीफा देना, पत्रकारों का मोदी सरकार का गुण गान करना, मीडिया संस्थाओं को सरकारों के करीबी मित्रों के द्वारा खरीदा जाना उदाहरण के लिए एनडीटीवी, सरकार के विपक्ष में किसी पत्रकार ने अगर ट्वीट कर दिया तो मीडिया संस्थाओं द्वारा पत्राकार से इस्तीफा ले लेना उदाहरण श्याम मीरा सिंह, अगर कोई मीडिया सरकारों पर डॉक्यूमेंट्री बनता है और सरकारों की पोल खोलता है तो ईडी, सीबीआई, मीडिया पर रेड डाल देती हैं उदाह...

गरीबों के साथ कौन खेला कर रहा है?

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मजदूर  27 नवंबर 1942 को हुई सातवीं लेबर कॉन्फ्रेंस में बाबा साहब ने काम के घंटे 14 से घटाकर 8 कर दिए। उससे पहले भारत में मजदूरों को 14-15 घंटे काम करना पड़ता था। ये बिल पेश करते हुए बाबा साहब ने कहा था 'काम के घंटे घटाने का मतलब है रोजगार का बढ़ना लेकिन काम का समय 12 से 8 घंटे किये जाते समय वेतन कम नहीं किया जाना चाहिए।' जिसका मतलब साफ साफ था कि 8 घंटे काम करने वाले का वेतन कम नहीं होना चाहिए। ओर ये बिल रोजगार बढ़ाने के लिये था ना कि वेतन कम करने के लिए। पर देश का दुर्भाग्य यह है कि जो लोग प्राइवेट या सरकारी संस्थाओं में काम कर रहे हैं उन्हें बाबा साहेब के दिए हुए इस कानून के बारे में पता ही नहीं है।  आज एक व्यक्ति किसी भी संस्थान में काम कर रहा हो क्या उसे उतना मुल्य या वेतन मिल रहा है कि वह अपना जीवन अच्छे से जी सके? क्या व्यक्ती रोज 500/- रू कमा रहा हैं याने की 15 हज़ार रू प्रति महीना आज के समय में इतनी महंगाई में 15 हजार के वेतन में वह कैसे अपना जीवन सम्मान पूर्वक जी सकेगा।  क्या सरकारों को काम का मुल्य 500 /- रू प्रति दिन से बड़ा कर 1500/- रू प्रति दिन कर देना चा...