गरीबों के साथ कौन खेला कर रहा है?
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| मजदूर |
27 नवंबर 1942 को हुई सातवीं लेबर कॉन्फ्रेंस में बाबा साहब ने काम के घंटे 14 से घटाकर 8 कर दिए। उससे पहले भारत में मजदूरों को 14-15 घंटे काम करना पड़ता था। ये बिल पेश करते हुए बाबा साहब ने कहा था
'काम के घंटे घटाने का मतलब है रोजगार का बढ़ना लेकिन काम का समय 12 से 8 घंटे किये जाते समय वेतन कम नहीं किया जाना चाहिए।'
जिसका मतलब साफ साफ था कि 8 घंटे काम करने वाले का वेतन कम नहीं होना चाहिए। ओर ये बिल रोजगार बढ़ाने के लिये था ना कि वेतन कम करने के लिए। पर देश का दुर्भाग्य यह है कि जो लोग प्राइवेट या सरकारी संस्थाओं में काम कर रहे हैं उन्हें बाबा साहेब के दिए हुए इस कानून के बारे में पता ही नहीं है।
आज एक व्यक्ति किसी भी संस्थान में काम कर रहा हो क्या उसे उतना मुल्य या वेतन मिल रहा है कि वह अपना जीवन अच्छे से जी सके? क्या व्यक्ती रोज 500/- रू कमा रहा हैं याने की 15 हज़ार रू प्रति महीना आज के समय में इतनी महंगाई में 15 हजार के वेतन में वह कैसे अपना जीवन सम्मान पूर्वक जी सकेगा।
क्या सरकारों को काम का मुल्य 500 /- रू प्रति दिन से बड़ा कर 1500/- रू प्रति दिन कर देना चाहिए?
इसके क्या परिणाम होंगे:-
व्यक्ती किसी के आगे मजबूर नहीं रहेगा वह खुद को स्वतंत्र महसूस करेगा। उसके जीवन की परिस्थितिया बदलेगी।वह काम के साथ-साथ अपने भविष्य के लिए नया कोशल भी सीखेगा।
आमदनी बढ़ेगी तो वह खर्चा भी करेगा जिससे बाजर में उछाल आयेगा, चीजों की मांग बढ़ेगी, लोगों का व्यापार बढ़ेगा, सरकार का टैक्स कलेक्शन बढ़ेगा। जिससे सरकारों के पास पैसे की कोई कमी नहीं होगी।
पर वेतन 500 /- रू प्रति दिन से बड़ा कर 1500/-रू प्रति दिन का बिल लाएगा कौन? सरकारें, उनके मंत्रियों और उन मंत्रियों के सचिवों को इतना समय है कि वे आम आदमियों की समस्या पर ध्यान दे। वे तो बस वोट की भीख मांगने आते हैं बस और जनता भी उनसे सवाल नहीं करती और जो सवाल करते हैं उन्हें सरकारें गोल मोल जवाब दे देती हैं या अगर सरकार के खिलाफ हो तो तानाशाही कर के पूरा जीवन उसे कोर्ट के चक्कर लगवा देंगे।
सरकारें बस नारा देती हैं गरीबी हटा देंगे तो करो ना 75 साल हो गये सुनते सुनते पर बस सब नेता काम चोर ही निकले हैं कोई नेता भारत का विकास नहीं कर रहा है अपना विकास कर रहा है। सरकारों को प्राइवेट संस्थाओ से चंदा मिलता है तो वे सरकारे संस्थाओ के सामने भिखारी और नौकर बन जाती है बिल वही बनाए जाते हैं जो संस्थाओ के हित में हो, जनता के हितों में तो बस बात होती है, पर बिल आते आते वह बिल ही संस्थाओ के हित में हो जाता है।
क्या आप के नेता में है दम जो आम इंसान के कार्य का मुल्य 500 /- रू प्रति दिन से बड़ा कर 1500/-रू प्रति दिन की कर दे अगर है तो कमेन्ट करे।
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| भारतीय मजदूर |

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